शनिवार, 16 अप्रैल 2011

सौदा हमारा कभी बाज़ार तक नहीं पहुँचा // sauda hamara kabhi bazaar tak nahi pahuchaa

सौदा हमारा कभी बाज़ार तक नहीं पहुँचा
इश्क था कि कभी इज़हार तक नहीं पहुँचा

यूं तो गुफ्तगूं बहुत हुयी उनसे फिर भी
सिलसिला कभी ये प्यार तक नहीं पहुँचा

जाने कैसे हो गया वाकिफ तमाम शहर
दास्ताँ-ए-इश्क यूं तो कभी अखबार तक नहीं पहुँचा

शर्तें एक दूसरे की मंज़ूर थीं यूं तो  
पर मसौदा हमारा कभी करार तक नहीं पहुँचा

गहराई दोस्ती कि मैं नापता भी कैसे
रिश्ता हमारा कभी तकरार तक नहीं पहुँचा

अना मेरी मुझे इजाज़त नहीं देती
फक़त इसलिए 'अमित' कभी दरबार तक नहीं पहुँचा

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sauda hamara kabhi bazaar tak nahi pahuchaa
ishq tha jo kabhi izhaar taq nahi pahuchaa

yoon to guftagoon bahut huyi unse fir bhi
silsila kabhi ye pyaar taq nahi pahuchaa

jaane kaise ho gaya waakif tamaam shahar
daastaan-e-ishq yoon to kabhi akhbaar taq nahi pahuchaa

sharte ek doosare ki manzoor thi yoon to
par masauda hamaara kabhi karaar tak nahi pahucha

gahraayi dosti ki main naapta bhi kaise
rishta hamara kabhi taqraar taq nahi pahunchaa

anaa meri mujhe izaazat nahi deti
faqat isliye 'amit' darbaar taq nahi pahuchaa

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* अना anaa                 = Ego आत्म सम्मान
* मसौदा masauda        = draft, deed
* करार karaar              = agreement

3 टिप्‍पणियां:

  1. Amit Ji , ye aapki behtreen gazlo me se behtreen gazal hai. Har ek sher apne aap me pura Vazood samete hai .. Apne aap me pura hai..
    Yahan apki jajbato par Shabdo ki pakad lajwab hai ...
    Dil ke dard ko aap Jo apne alfaso ka jama pehnate hain .... Kabile tarif hai.

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  2. amit aapne apni is gazal se laajawaab kar diya hai par tab bhi jo kuchh ban pada wo likh de rahin hoon....................

    जो तुममें-मुझमें हैं उसका इज़हार रहने दो

    महफ़िल में बस अपनी नज़रें चार रहने दो





    तेरे से बावस्ता है मेरी खुशी तुम वो रहने दो

    गम हो तुम्हें अगर तो मुझे अश्कबार रहने दो





    हम-तुम मिल के बाटेंगे सब ,वो करार रहने दो

    दर्द सब मैं रख लूं मुझपे खुशियाँ उधार रहने दो







    जो एक रात में उतर जाए ऐसा खुमार रहने दो

    तेरे ख्याल से जो आ जाता है वो निखार रहने दो







    जहां बिक जाए मोहब्बत ऐसा बाज़ार रहने दो

    किसी मोल पे भी जो न बिके ऐसा प्यार रहने दो

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  3. अमित भाई, क्या खूब लिखा आपने, सीधे दिल में उतर गया...

    आपकी इतनी खूबसूरत गज़ल और उसपर निधि जी की भावपूर्ण रचना, कुछ लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ... चलिए आज सिर्फ इतना ही...
    बहुत हो चुका अब किस्सा, ये नहीं पहुंचा, वो नहीं पहुंचा,
    चलो अब देख लें, जो दिल को छू गया था वो कहाँ तक पहुंचा...

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